CURRENT AFFAIRS – 03th JULY 2021

CURRENT AFFAIRS – 03th JULY 2021

सरकार ने खुदरा और थोक व्यापार को सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम के रूप में शामिल करने की घोषणा की

केंद्रीय एमएसएमई, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री (Union MSME, Road Transport And Highways Minister) नितिन गडकरी (Nitin Gadkari) ने खुदरा और थोक व्यापार को MSME के रूप में शामिल करते हुए एमएसएमई के लिए संशोधित दिशानिर्देशों का ऐलान किया है. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हम MSME को मजबूत बनाने और उन्हें आर्थिक प्रगति का इंजन बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं. गडकरी ने कहा कि संशोधित दिशानिर्देशों से ढाई करोड़ खुदरा और थोक व्यापारियों को लाभ मिलेगा. बता दें कि कोरोना वायरस महामारी के रूप में खुदरा और थोक व्यापारियों को काफी नुकसान का सामना करना पड़ा है. सरकार ने उनको उस नुकसान से उबरने के लिए यह फैसला लिया है.

खुदरा और थोक व्यापार को एमएसएमई के रूप में शामिल करना एक ऐतिहासिक कदम

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने इस फैसले को ऐतिहासिक करार दिया है. उन्होंने ट्वीट किया है कि खुदरा और थोक व्यापार को एमएसएमई के रूप में शामिल करने का एक ऐतिहासिक कदम हमारी सरकार ने उठाया है. सरकार के इस कदम से हमारे व्यापारियों को आसानी से ऋण मिलने के साथ कई अन्य लाभ मिलेंगे. साथ ही उनके कारोबार में भी बढ़ोतरी होगी. उन्होंने कहा कि हमारी सरकार व्यापारियों को सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

नितिन गडकरी ने कहा कि खुदरा और थोक व्यापार को अभी तक एमएसएमई के दायरे से बाहर रखा गया था, लेकिन अब संशोधित दिशानिर्देशों के तहतखुदरा और थोक व्यापार को भी भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के दिशानिर्देशों के अनुसार प्राथमिकता वाले क्षेत्र के तहत ऋण प्राप्त करने का लाभ मिलेगा.

सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग (Micro, Small and medium enterprises) वे उद्योग हैं जिनमें काम करने वालों की संख्या एक सीमा से कम होती है तथा उनका वार्षिक उत्पादन (turnover) भी एक सीमा के अन्दर रहता है। किसी भी देश के विकास में इनका महत्वपूर्ण स्थान है।

भारत में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग[संपादित करें]

भारत सरकार ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम विकास (एमएसएमईडी[मृत कड़ियाँ]) अधिनियम 2006 अधिनियमित किया था जिसके अनुसार सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों की परिभाषा उन उद्योगों में ‘प्लान्ट एवं मशीनरी’ में निवेश के अनुसार निर्धारित होती थी। किन्तु 7 अप्रैल,2018 से नई परिभाषा लागू है जिसे प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी की बैठक में अंतिम रूप दिया गया था। इस परिवर्तन के बाद अब “प्लांट और मशीनरी” में निवेश की जगह “टर्नओवर” के आधार पर MSMEs वर्गीकरण किया जायेगा।

विनिर्माण क्षेत्र

किसी वस्तु के निर्माण अथवा उत्पादन, प्रसंस्करण अथवा परिरक्षण करने वाले उद्यम इस श्रेणी में शामिल किये जाते हैं।

सूक्ष्म उद्योग — वार्षिक टर्न ओवर रु. 5 करोड़ से कम

लघु उद्योग — वार्षिक टर्न ओवर रु. 5 करोड़ से 75 करोड़ के बीच

मध्यम उद्योग — वार्षिक टर्न ओवर रु. 75 करोड़ से 250 करोड़ के बीच

सेवा क्षेत्र

सूक्ष्म उद्योग — वार्षिक टर्न ओवर रु. 5 करोड़ से कम

लघु उद्योग — वार्षिक टर्न ओवर रु. 5 करोड़ से 75 करोड़ के बीच

मध्यम उद्योग — वार्षिक टर्न ओवर रु. 75 करोड़ से 250 करोड़ के बीच

एमएसएमई की नई परिभाषा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम को संक्षिप्त में MSME कहा जाता है. एमएसएमई दो प्रकार के होते हैं. मैनुफैक्चरिंग उद्यम यानी उत्पादन करने वाली इकाई. दूसरा है सर्विस एमएसएमई इकाई. यह मुख्य रुप से सेवा देने का काम करती हैं. हाल ही में सरकार ने एमएसएमई की परिभाषा बदली है. नए बदलाव के निम्न श्रेणी के उद्यम सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग में आएंगे.

सूक्ष्म उद्योग: सूक्ष्म उद्योग के अंतर्गत रखा अब वह उद्यम आते हैं जिनमें एक करोड़ रुपये का निवेश (मशीनरी वगैरह में) और टर्नओवर 5 करोड़ तक हो. यहां निवेश से मतलब यह है कि कंपनी ने मशीनरी वगैरह में कितना निवेश किया है. यह मैन्युफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर दोनों क्षेत्र के उद्यमों पर लागू होता है.

लघु उद्योग: उन उद्योगों को लघु उद्योग की श्रेणी में रखते है जिन उद्योगों में निवेश 10 करोड़ और टर्नओवर 50 करोड़ रुपये तक है. यह निवेश और टर्नओवर की सीमा मैन्युफ ..और सर्विस दोनों सेक्टर में लागू होती है.

मध्यम उद्योग: मैनुफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के ऐसे उद्योग जिनमें 50 करोड़ का निवेश और 250 करोड़ टर्नओवर है वह मध्मम उद्योग में आएंगे . इससे पहले वित्त मंत्री ने आत्मनिर्भर पैकेज का ऐलान करते हुए एमएसएमई की परिभाषा बदली थी. वित्त मंत्री ने 20 करोड़ रुपये का निवेश और 100 करोड़ रुपये का टर्नओवर वाले उद्यमों को मध्यम उद्योग में रखा था. लेकिन उद्यमी सरकार के इस नए बदलाव से भी खुश नहीं था. इसके बाद 1 जून 2020 को हुई कैबिनेट बैठक में ससरकार ने उद्यमियों की मांग को पूरा करते हुए यह बदलाव किया है. अब मैनुफैक्चरिंग और सर्विस सेक्टर के ऐसे उद्योग जिनमें 50 करोड़ का निवेश (मशीन और यूनिट लगाने का खर्च आदि) और 250 करोड़ टर्नओवर है वह मध्मम उद्योग में आएंगे

SOURCE-PIB

 

G20-OECD टैक्स फ्रेमवर्क डील में शामिल हुआ भारत

भारत और OECD व G20 Inclusive Framework on Base Erosion & Profit Shifting के ज़्यादातर सदस्यों ने एक उच्च-स्तरीय स्टेटमेंट को अपनाया जो अर्थव्यवस्था के डिजिटलीकरण से उत्पन्न होने वाली कर चुनौतियों का समाधान करने के लिए एक आम सहमति समाधान की रूपरेखा तैयार करता है।

मुख्य बिंदु

  • इस प्रस्तावित समाधान में दो घटक शामिल हैं:
  1. 1. पहला स्तंभ बाजार के अधिकार क्षेत्र में अतिरिक्त लाभ हिस्सेदारी के पुन: आवंटन के बारे में है और
  2. 2. दूसरे स्तंभ में न्यूनतम कर और कर नियम शामिल हैं।
  • हालांकि, कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे जैसे लाभ आवंटन का हिस्सा और कर नियमों का दायरा खुला है और इसे संबोधित करने की आवश्यकता है।
  • इस प्रस्ताव के तकनीकी विवरण पर जल्द ही काम किया जाएगा और अक्टूबर 2021 तक आम सहमति बन जाएगी।

यह भारत को कैसे प्रभावित करेगा?

वैश्विक न्यूनतम कर नियम यह सुनिश्चित करेगा कि भारत जैसे देशों को कर सुरक्षित बंदरगाह प्रदान किए बिना MNEs के लिए बड़े पैमाने पर बाजार मिले

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) 38 देशों का एक अंतरराष्ट्रीय, अंतर सरकारी आर्थिक संगठन है। OECD की स्थापना वर्ष 1961 में विश्व व्यापार और आर्थिक प्रगति को प्रोत्साहित करने के लिए की गई थी

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) 2021 में अपनी 60वीं वर्षगांठ मना रहा है।

ओईसीडी ने एक शोध विश्लेषण ‘द लॉन्ग व्यू: परिदृश्य फॉर द वर्ल्ड इकोनॉमी टू 2060’ जारी किया है। शोध के निष्कर्षों के अनुसार-

दुनिया की वास्तविक जीडीपी वृद्धि 2018 में 3.5% से घटकर 2060 में 2% हो जाएगी।

2060 तक, भारत, चीन और इंडोनेशिया संयुक्त रूप से दुनिया के लगभग आधे आर्थिक उत्पादन का प्रतिनिधित्व करेंगे।

ओईसीडी के बारे में

अधिकांश ओईसीडी सदस्य उच्च आय वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं जिनका मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) बहुत अधिक है और उन्हें विकसित देश माना जाता है। ओईसीडी सदस्य लोकतांत्रिक देश हैं जो मुक्त बाजार अर्थव्यवस्थाओं का समर्थन करते हैं।

यह अपने सदस्य देशों को नीतिगत अनुभवों की तुलना करने, सामान्य समस्याओं के उत्तर खोजने, सर्वोत्तम प्रथाओं की पहचान करने और साझा करने और अपने सदस्य देशों की घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय नीतियों का समन्वय करने के लिए एक मंच प्रदान करता है।

ओईसीडी संयुक्त राष्ट्र का एक आधिकारिक स्थायी पर्यवेक्षक है और इसे एक थिंक-टैंक या एक निगरानी समूह के रूप में जाना जाता है।

ओईसीडी का मुख्यालय पेरिस, फ्रांस में चातेऊ डे ला म्यूएट में है।

ओईसीडी सदस्य राज्यों में सामूहिक रूप से वैश्विक नाममात्र सकल घरेलू उत्पाद का 62.2% (US$49.6 ट्रिलियन) और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 42.8% (Int $54.2 ट्रिलियन) 2017 में क्रय शक्ति समानता पर शामिल था।

अंतर्राष्ट्रीय डॉलर: इसे गेरी-खामिस डॉलर के नाम से भी जाना जाता है।

यह मुद्रा की एक काल्पनिक इकाई है जिसमें समान क्रय शक्ति समानता (पीपीपी) है जो यू.एस. डॉलर के पास एक निश्चित समय में संयुक्त राज्य अमेरिका में थी।

यह विभिन्न उद्देश्यों के लिए अर्थशास्त्र और वित्तीय आंकड़ों में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता है, जैसे पीपीपी और विभिन्न देशों और बाजारों के सकल घरेलू उत्पाद का निर्धारण और विश्लेषण करना।

यह मुद्राओं के पीपीपी की जुड़वां अवधारणाओं और वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय औसत कीमतों पर आधारित है।

ओईसीडी इतिहास

OECD की शुरुआत 1948 में यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन (OEEC) के रूप में हुई थी।

यूरोपीय आर्थिक सहयोग संगठन (OEEC) की स्थापना महाद्वीप पर युद्ध के बाद के पुनर्निर्माण के लिए मुख्य रूप से यूएस-वित्त पोषित मार्शल योजना को नियंत्रित करने के लिए की गई थी।

ओईईसी यूरोपीय आर्थिक समुदाय (ईईसी) की मदद करने में सहायक था। यूरोपीय मुक्त व्यापार क्षेत्र स्थापित करने के लिए ईईसी यूरोपीय संघ (ईयू) में विकसित हुआ है।

1961 में ओईईसी का नाम बदलकर ओईसीडी कर दिया गया जब संयुक्त राज्य अमेरिका और कनाडा एक व्यापक सदस्यता को दर्शाने के लिए शामिल हुए।

SOURCE-THE HINDU

 

 

अमेरिका सेना ने अफगानिस्तान में बगराम (Bagram) हवाई अड्डा छोड़ा

अमेरिका की सेना ने लगभग दो दशकों के बाद अफगानिस्तान के बगराम (Bagram) हवाई क्षेत्र को छोड़ दिया है।

मुख्य बिंदु

  • बगराम हवाई क्षेत्र 9/11 के आतंकी हमलों की पृष्ठभूमि में अफगानिस्तान में कई सैन्य मुठभेड़ों और अमेरिका के ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ का केंद्र था।
  • बगराम हवाई क्षेत्र को अब अफगान राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा बल को सौंप दिया गया है।
  • यह एयरबेस तालिबान और अल-कायदा आतंकवादी संगठनों के खिलाफ अमेरिकी सेना के युद्ध का स्थल रहा है।
  • इसमें अमेरिकी सेना के 455वें वायु अभियान विंग के कर्मचारियों ने का किया।
  • इसे अमेरिकी सेना, नौसेना की इकाइयों ने इस्तेमाल किया, और मरीन कोर ने इस हवाई क्षेत्र को बेस के रूप में भी इस्तेमाल किया है।

पृष्ठभूमि

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाईडेन ने 11 सितंबर तक अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की पूरी तरह से वापसी का वादा किया था। बगराम एयरबेस से 2,500-3,500 अमेरिकी सैनिकों की वर्तमान वापसी उस वादे पर अनुवर्ती कार्रवाई का संकेत है। अब, अमेरिका काबुल में अमेरिकी दूतावास की सुरक्षा के लिए अफगानिस्तान में लगभग 6,500 सैनिकों को शरण देता है।

बगराम एयरफील्ड (Bagram Airfield)

इसे बगराम एयर बेस के नाम से भी जाना जाता है और यह प्राचीन शहर बगराम के पास स्थित है। यह अफगानिस्तान में सबसे बड़ा अमेरिकी सैन्य अड्डा था। परवान प्रांत से इसकी दूरी 11 किलोमीटर है। इसमें एक सिंगल रनवे है जो लॉकहीड मार्टिन C-5 गैलेक्सी और एंटोनोव  A-225 सहित बड़े सैन्य विमानों को संभालने में सक्षम है।

अफ़ग़ानिस्तान

अफ़ग़ानिस्तान इस्लामी गणराज्य दक्षिण एशिया में अवस्थित देश है, जो विश्व का एक भूूूूूू-आवेष्ठित देश है। अप्रैल २००७ में अफगानिस्तान सार्क का आठवां सदस्य बना। अफगानिस्तान के पूर्व में पाकिस्तान, उत्तर पूर्व में भारत तथा चीन, उत्तर में ताजिकिस्तान, कज़ाकस्तान तथा तुर्कमेनिस्तान तथा पश्चिम में ईरान है।

अफ़ग़ानिस्तान रेशम मार्ग और मानव प्रवास का एक प्राचीन केन्द्र बिन्दु रहा है। पुरातत्वविदों को मध्य पाषाण काल के मानव बस्ती के साक्ष्य मिले हैं। इस क्षेत्र में नगरीय सभ्यता की शुरुआत 3000 से 2,000 ई.पू. के रूप में मानी जा सकती है। यह क्षेत्र एक ऐसे भू-रणनीतिक स्थान पर अवस्थित है जो मध्य एशिया और पश्चिम एशिया को भारतीय उपमहाद्वीप की संस्कृति से जोड़ता है। इस भूमि पर कुषाण, हफ्थलिट, समानी, गजनवी, मोहमद गौरी, मुगल, दुर्रानी और अनेक दूसरे प्रमुख साम्राज्यों का उत्थान हुआ है। प्राचीन काल में फ़ारस तथा शक साम्राज्यों का अंग रहा अफ़्ग़ानिस्तान कई सम्राटों, आक्रमणकारियों तथा विजेताओं की कर्मभूमि रहा है। इनमें सिकन्दर, फारसी शासक दारा प्रथम, तुर्क,मुगल शासक बाबर, मुहम्मद गौरी, नादिर शाह सिख साम्राज्य इत्यादि के नाम प्रमुख हैं। ब्रिटिश सेनाओं ने भी कई बार अफ़ग़ानिस्तान पर आक्रमण किया। वर्तमान में अमेरिका द्वारा तालेबान पर आक्रमण किये जाने के बाद नाटो(NATO) की सेनाएं वहां बनी हुई हैं।

अफ़ग़ानिस्तान के प्रमुख नगर हैं- राजधानी काबुल, कंधार (गंधार प्रदेश) भारत के प्राचीन ग्रंथ महाभारत में इसे गंधार प्रदेश कहा जाता था। यहाँ कई नस्ल के लोग रहते हैं जिनमें पश्तून (पठान या अफ़ग़ान) सबसे अधिक हैं। इसके अलावा उज्बेक, ताजिक, तुर्कमेन और हज़ारा शामिल हैं। यहाँ की मुख्य भाषा पश्तो है। फ़ारसी भाषा के अफ़गान रूप को दरी कहते हैं।

उन्नीसवीं सदी में आंग्ल-अफ़ग़ान युद्धों के कारण अफ़ग़ानिस्तान का काफी हिस्सा ब्रिटिश इंडिया के अधीन हो गया जिसके बाद अफ़ग़ानिस्तान में यूरोपीय प्रभाव बढ़ता गया। १९१९ में अफ़ग़ानिस्तान ने विदेशी ताकतों से एक बार फिर स्वतंत्रता पाई। आधुनिक काल में १९३३-१९७३ के बाच का काल अफ़ग़ानिस्तान का सबसे अधिक व्यवस्थित काल रहा जब ज़ाहिर शाह का शासन था। पर पहले उसके जीजा तथा बाद में कम्युनिस्ट पार्टी के सत्तापलट के कारण देश में फिर से अस्थिरता आ गई। सोवियत सेना ने कम्युनिस्ट पार्टी के सहयोग के लिए देश में कदम रखा और मुजाहिदीन ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया और बाद में अमेरिका तथा पाकिस्तान के सहयोग से सोवियतों को वापस जाना पड़ा। ११ सितम्बर २००१ के हमले में मुजाहिदीन के सहयोग होने की खबर के बाद अमेरिका ने देश के अधिकांश हिस्से पर सत्तारुढ़ मुजाहिदीन (तालिबान), जिसको कभी अमेरिका ने सोवियत सेनाओं के खिलाफ लड़ने में हथियारों से सहयोग दिया था, के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

भूगोल

अफ़ग़ानिस्तान चारों ओर से ज़मीन से घिरा हुआ है और इसकी सबसे बड़ी सीमा पूर्व की ओर पाकिस्तान से लगी है। इसे डूरण्ड रेखा भी कहते हैं। केन्द्रीय तथा उत्तरपूर्व की दिशा में पर्वतमालाएँ हैं जो उत्तरपूर्व में ताजिकिस्तान स्थित हिन्दूकुश पर्वतों का विस्तार हैं। अक्सर तापमान का दैनिक अन्तरण अधिक होता है। 1934 में लीग आफ नेशन का सदस्य हुआ 1945 में है संयुक्त राष्ट्र संघ में शामिल हुआ

तालिबान आख़िर हैं कौन

अफ़ग़ानिस्तान में अमेरिकी नेतृत्व वाली सेना ने तालिबान को साल 2001 में सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया था.

लेकिन धीरे-धीरे ये समूह खुद को मज़बूत करता गया और अब एक बार फिर से इसका दबदबा देखने को मिल रहा है.

क़रीब दो दशक बाद, अमेरिका 11 सितंबर, 2021 तक अफ़ग़ानिस्तान से अपने सभी सैनिकों को हटाने की तैयारी कर रहा है. वहीं तालिबानी लड़ाकों का नियंत्रण क्षेत्र बढ़ता जा रहा है. आशंका यह भी उभरने लगी है कि वे सरकार को अस्थिर कर सकते हैं.

दोहा समझौता

तालिबान ने अमेरिका के साथ साल 2018 में बातचीत शुरू कर दी थी.

फरवरी, 2020 में दोहा में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ जहां अमेरिका ने अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को हटाने की प्रतिबद्धता जताई और तालिबान अमेरिकी सैनिकों पर हमले बंद करने को तैयार हुआसमझौते में तालिबान ने अपने नियंत्रण वाले इलाक़े में अल क़ायदा और दूसरे चरमपंथी संगठनों के प्रवेश पर पाबंदी लगाने की बात भी कही और राष्ट्रीय स्तर की शांति बातचीत में शामिल होने का भरोसा दिया था.

लेकिन समझौते के अगले साल से ही तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान के आम नागिरकों और सुरक्षा बल को निशाना बनाना जारी रखा.

अब जब अमेरिकी सैनिक अफ़ग़ानिस्तान से विदा होने की तैयारी कर रहे हैं तब तालिबानी समूह तेजी से देश में पांव पसार रहा है.

कब हुई थी तालिबान की शुरुआत

पश्तो जुबान में छात्रों को तालिबान कहा जाता है. नब्बे के दशक की शुरुआत में जब सोवियत संघ अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुला रहा था, उसी दौर में तालिबान का उभार हुआ.

माना जाता है कि पश्तो आंदोलन पहले धार्मिक मदरसों में उभरा और इसके लिए सऊदी अरब ने फंडिंग की. इस आंदोलन में सुन्नी इस्लाम की कट्टर मान्यताओं का प्रचार किया जाता था.

जल्दी ही तालिबानी अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान के बीच फैले पश्तून इलाक़े में शांति और सुरक्षा की स्थापना के साथ-साथ शरिया क़ानून के कट्टरपंथी संस्करण को लागू करने का वादा करने लगे थे.

इसी दौरान दक्षिण पश्चिम अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का प्रभाव तेजी से बढ़ा. सितंबर, 1995 में उहोंने ईरान की सीमा से लगे हेरात प्रांत पर कब्ज़ा किया. इसके ठीक एक साल बाद तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की राजधानी क़ाबुल पर कब्ज़ा जमाया.

अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण

उन्होंने उस वक्त अफ़ग़ानिस्तान के राष्ट्रपति रहे बुरहानुद्दीन रब्बानी को सत्ता से हटाया था. रब्बानी सोवियत सैनिकों के अतिक्रमण का विरोध करने वाले अफ़ग़ान मुजाहिदीन के संस्थापक सदस्यों में थे.

साल 1998 आते-आते, क़रीब 90 प्रतिशत अफ़ग़ानिस्तान पर तालिबान का नियंत्रण हो गया था.

सोवियत सैनिकों के जाने के बाद अफ़ग़ानिस्तान के आम लोग मुजाहिदीन की ज्यादतियों और आपसी संघर्ष से ऊब गए थे इसलिए पहले पहल तालिबान का स्वागत किया गया.

भ्रष्टाचार पर अंकुश, अराजकता की स्थिति में सुधार, सड़कों का निर्माण और नियंत्रण वाले इलाक़े में कारोबारी ढांचा और सुविधाएं मुहैया कराना- इन कामों के चलते शुरुआत में तालिबानी लोकप्रिय भी हुए.

लेकिन इसी दौरान तालिबान ने सज़ा देने के इस्लामिक तौर तरीकों को लागू किया जिसमें हत्या और व्याभिचार के दोषियों को सार्वजनिक तौर पर फांसी देना और चोरी के मामले में दोषियों के अंग भंग करने जैसी सजाएं शामिल थीं.

पुरुषों के लिए दाढ़ी और महिलाओं के लिए पूरे शरीर को ढकने वाली बुर्क़े का इस्तेमाल ज़रूरी कर दिया गया. तालिबान ने टेलीविजन, संगीत और सिनेमा पर पाबंदी लगा दी और 10 साल और उससे अधिक उम्र की लड़कियों के स्कूल जाने पर रोक लगा दी.

तालिबान सरकार को मान्यता देने वाले देश

तालिबान पर मानवाधिकार के उल्लंघन और सांस्कृतिक दुर्व्यवहार से जुड़े कई आरोप लगने शुरू हो गए थे.

इसका एक बदनामी भरा उदाहरण साल 2001 में तब देखने को मिला जब तालिबान ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विरोध के बाद भी मध्य अफ़ग़ानिस्तान के बामियान में बुद्ध की प्रतिमा को नष्ट कर दिया.

तालिबान को बनाने और मज़बूत करने के आरोपों से पाकिस्तान लगातार इनकार करता रहा है लेकिन इस बात में कोई संदेह नहीं है कि शुरुआत में तालिबानी आंदोलन से जुड़ने वाले लोग पाकिस्तान के मदरसों से निकले थे.

अफ़ग़ानिस्तान पर जब तालिबान का नियंत्रण था तब पाकिस्तान दुनिया के उन तीन देशों में शामिल था जिसने तालिबान सरकार को मान्यता दी थी. पाकिस्तान के अलावा सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात ने भी तालिबान सरकार को स्वीकार किया था.

SOURCE-BBC NEWS AND GK TODAY

 

 

लुडविग गुटमैन

हाल ही में गूगल ने लुडविग गुटमैन के सम्मान में एक डूडल जारी किया। दरअसल वे एक न्यूरोलॉजिस्ट थे, परन्तु उन्हें पैरालिम्पिक गेम्स के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। 3 जुलाई को उनके जन्म दिवस पर गूगल ने उन्हें डूडल के माध्यम से सम्मानित किया है।

लुडविग गुटमैन (Ludwig Guttmann)

लुडविग गुटमैन का जन्म 3 जुलाई, 1899 को जर्मन साम्राज्य के प्रुशिया में हुआ था। वे एक यहूदी थे। जर्मनी में नाजियों के सत्ता में आने के बाद उन्होंने जर्मनी छोड़ कर जाना पड़ा। वे बाद में इंग्लैंड के लन्दन में बस गया जहाँ उन्होंने न्यूरोलॉजी से सम्बंधित अपना शोध कार्य जारी रखा। वे 1945 में ब्रिटेन ने नागरिक बन गये। उन्होंने 29 जुलाई, 1948 को लन्दन ओलिंपिक की शुरुआत के साथ ही दिव्यांग सैनिकों के पहले स्टोक मेंडविले गेम्स का आयोजन किया। बाद में यही खेल पैरालिम्पिक गेम्स बने।

SOURCE-GK TODAY

 

 

2020 कुवेम्पु राष्ट्रीय पुरस्कार

उड़िया कवि डॉ. राजेंद्र किशोर पांडा (Dr. Rajendra Kishore Panda) को कुवेम्पु राष्ट्रीय पुरस्कार 2020 (Kuvempu Rashtriya Puraskar 2020) से सम्मानित किया गया है।

मुख्य बिंदु

डॉ. पांडा के नाम को प्रो. हम्पा नागराजैया की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति द्वारा अंतिम रूप दिया गया था। इस समिति के अन्य सदस्यों में बंगाली लेखक श्यामल भट्टाचार्य, कन्नड़ कवि डॉ एच.एस. शिवप्रकाश और केंद्रीय साहित्य अकादमी के पूर्व सचिव अग्रहारा कृष्णमूर्ति शामिल हैं।

कुवेम्पु राष्ट्रीय पुरस्कार (Kuvempu Rashtriya Purashar)

  • कुवेम्पु राष्ट्रीय पुरस्कार दिवंगत कवि कुवेम्पु की स्मृति में स्थापित किया गया था।
  • इस पुरस्कार में 5 लाख रुपये का नकद पुरस्कार, एक रजत पदक और एक प्रशस्ति पत्र शामिल है।
  • यह पुरस्कार राष्ट्रकवि कुवेम्पु ट्रस्ट द्वारा 2013 में स्थापित किया गया था ताकि साहित्यकारों को भारतीय संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त भारतीय भाषाओं में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया जा सके।
  • मलयालम, उर्दू, हिंदी, मराठी, पंजाबी और कन्नड़ के लेखकों को यह पुरस्कार प्रदान किया गया है।
  • उन्हें शिवमोग्गा जिले के कुप्पली में आयोजित कार्यक्रमों में सम्मानित किया गया।यह जिला कुवेम्पु का जन्मस्थान है।
  • यह पुरस्कार आमतौर पर 29 दिसंबर को प्रदान किया जाता है, लेकिन 2020 में COVID-19 महामारी के कारण इसमें देरी हुई।

डॉ. राजेंद्र किशोर पांडा (Dr. Rajendra Kishore Panda)

उनका जन्म 24 जून, 1944 को हुआ था। वे उड़िया भाषा में लिखते हैं। उनके 16 कविता संग्रह और एक उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। वह एक प्रमुख भारतीय कवि हैं जिन्होंने आधुनिक उड़िया कविता के मार्ग को महान ऊंचाइयों तक पहुंचाने में मदद की। उन्हें 2010 में गंगाधर राष्ट्रीय पुरस्कार और 1985 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्हें 2004 में संबलपुर विश्वविद्यालय द्वारा डी. लिट की डिग्री से भी सम्मानित किया गया था।

SOURCE-GK TODAY